Saturday, December 30, 2017

*ये वक्त है साहब.. ज़रूर बदलता है*

*"अनुभव कहता है*
*खामोशियाँ ही बेहतर हैं,*
*शब्दों से लोग रूठते बहुत हैं..."*

*जिंदगी गुजर गयी....*
*सबको खुश करने में ..*

*जो खुश हुए वो अपने नहीं थे,*
*जो अपने थे वो कभी खुश नहीं* *हुए...*

*कितना भी समेट लो..*
*हाथों से फिसलता ज़रूर है..*

*ये वक्त है साहब..*
*बदलता ज़रूर है..*

Wednesday, December 27, 2017

जब आंख खुली तो अम्‍मा की गोदी का एक सहारा था उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको भूमण्‍डल से प्‍यारा था


*एक बार इस कविता को*
*दिल से पढ़िये*
*शब्द शब्द में गहराई है...*

*जब आंख खुली तो अम्‍मा की*
*गोदी का एक सहारा था*
*उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको*
*भूमण्‍डल से प्‍यारा था*

*उसके चेहरे की झलक देख*
*चेहरा फूलों सा खिलता था*
*उसके स्‍तन की एक बूंद से*
*मुझको जीवन मिलता था*

*हाथों से बालों को नोंचा*
*पैरों से खूब प्रहार किया*
*फिर भी उस मां ने पुचकारा*
*हमको जी भर के प्‍यार किया*

*मैं उसका राजा बेटा था*
*वो आंख का तारा कहती थी*
*मैं बनूं बुढापे में उसका*
*बस एक सहारा कहती थी*

*उंगली को पकड. चलाया था*
*पढने विद्यालय भेजा था*
*मेरी नादानी को भी निज*
*अन्‍तर में सदा सहेजा था*

*मेरे सारे प्रश्‍नों का वो*
*फौरन जवाब बन जाती थी*
*मेरी राहों के कांटे चुन*
*वो खुद गुलाब बन जाती थी*

*मैं बडा हुआ तो कॉलेज से*
*इक रोग प्‍यार का ले आया*
*जिस दिल में मां की मूरत थी*
*वो रामकली को दे आया*

*शादी की पति से बाप बना*
*अपने रिश्‍तों में झूल गया*
*अब करवाचौथ मनाता हूं*
*मां की ममता को भूल गया*

*हम भूल गये उसकी ममता*
*मेरे जीवन की थाती थी*
*हम भूल गये अपना जीवन*
*वो अमृत वाली छाती थी*

*हम भूल गये वो खुद भूखी*
*रह करके हमें खिलाती थी*
*हमको सूखा बिस्‍तर देकर*
*खुद गीले में सो जाती थी*

*हम भूल गये उसने ही*
*होठों को भाषा सिखलायी थी*
*मेरी नीदों के लिए रात भर*
*उसने लोरी गायी थी*

*हम भूल गये हर गलती पर*
*उसने डांटा समझाया था*
*बच जाउं बुरी नजर से*
*काला टीका सदा लगाया था*

*हम बडे हुए तो ममता वाले*
*सारे बन्‍धन तोड. आए*
*बंगले में कुत्‍ते पाल लिए*
*मां को वृद्धाश्रम छोड आए*

*उसके सपनों का महल गिरा कर*
*कंकर-कंकर बीन लिए*
*खुदग़र्जी में उसके सुहाग के*
*आभूषण तक छीन लिए*

*हम मां को घर के बंटवारे की*
*अभिलाषा तक ले आए*
*उसको पावन मंदिर से*
*गाली की भाषा तक ले आए*

*मां की ममता को देख मौत भी*
*आगे से हट जाती है*
*गर मां अपमानित होती*
*धरती की छाती फट जाती है*

*घर को पूरा जीवन देकर*
*बेचारी मां क्‍या पाती है*
*रूखा सूखा खा लेती है*
*पानी पीकर सो जाती है*

*जो मां जैसी देवी घर के*
*मंदिर में नहीं रख सकते हैं*
*वो लाखों पुण्‍य भले कर लें*
*इंसान नहीं बन सकते हैं*

*मां जिसको भी जल दे दे*
*वो पौधा संदल बन जाता है*
*मां के चरणों को छूकर पानी*
*गंगाजल बन जाता है*

*मां के आंचल ने युगों-युगों से*
*भगवानों को पाला है*
*मां के चरणों में जन्‍नत है*
*गिरिजाघर और शिवाला है*

*हर घर में मां की पूजा हो*
*ऐसा संकल्‍प उठाता हूं*
*मैं दुनियां की हर मां के*
*चरणों में ये शीश झुकाता हूं..*

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Saturday, December 23, 2017

कभी हँसते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी* *कभी रोते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी।*

*कभी हँसते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी*
*कभी रोते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी।*
*न पूर्ण विराम सुख में,*
*न पूर्ण विराम दुःख में,*
*बस जहाँ देखो वहाँ अल्पविराम छोड़ देती है ये जिंदगी।*
*प्यार की डोर सजाये रखो,*
*दिल को दिल से मिलाये रखो,*
*क्या लेकर जाना है साथ मे इस दुनिया से,*
*मीठे बोल और अच्छे व्यवहार से*
        *रिश्तों को बनाए रखो*...........

Wednesday, December 13, 2017

जियो और जीना सिखा दो

*" चेहरे की हंसी से गम को भुला दो*
    *कम बोलो पर सब कुछ बता दो*
   *ख़ुद ना रूठो पर सबको हंसा दो*
      *यही राज है जिन्दगी का*
  *जियो और जीना सिखा दो "* 

Monday, November 27, 2017

कितने दूर  निकल गए, रिश्तो को निभाते निभाते..

*कितने दूर  निकल गए,
*रिश्तो को निभाते निभाते..

*खुद को  खो  दिया हमने,
*अपनों को पाते पाते..

*लोग कहते है हम  मुस्कुराते  बहोत है,
*और हम थक गए  दर्द  छुपाते छुपाते..

*खुश हूँ और सबको  खुश  रखता हूँ,
*लापरवाह हूँ फिर भी सबकी  परवाह करता हूँ..

*मालूम है कोई मोल नहीं मेरा,
*फिर भी...,
*कुछ अनमोल  लोगो से  रिश्ता बनाके रखता हूँ !!

Thursday, October 19, 2017

बिन माँगे सब मिल जायेगा

*होती आरती, बजते शंख,*
                *पूजा में सब खोए है,*
*मंदिर के बाहर तो देखो,*
                 *भूखे बच्चे सोए है |*
*एक निवाला इनको देना,*
                *प्रसाद मुझे चढ जायेगा,*
*मेरे दर पर माँगने वाले,*
       *तुझे बिन माँगे सब मिल जायेगा !*

ज़माने के रिवाजों से सबक मैंने ये सीखा है......

"ज़माने के रिवाजों से,
सबक मैंने ये सीखा है

"किसी के साथ मत चलना"

अगर चलना पड़े भी तो,
हमेशा फासले रखना

की ज्यादा पास आने से,
ये रिश्ते टूट जाते हैं।

Monday, October 9, 2017

*वैसा तो मैं इंसान नहीं।*

*कमियाँ तो मुझमें भी बहुत है,*
                      *पर मैं बेईमान नहीं।*
*मैं सबको अपना मानता हूँ,*
     *सोचता हूँ फायदा या नुकसान नहीं।*
*एक शौक है शान से जीने का,*
           *कोई और मुझमें गुमान नहीं।*
*छोड़ दूँ बुरे वक़्त में अपनों का साथ,*
                  *वैसा तो मैं इंसान नहीं।**

Friday, October 6, 2017

मेरे मालिक

*वो दिन कभी मत दिखाना*
*मेरे मालिक,*
*कि मुझे,*
*अपने आप पर*
*गुरुर हो जाये,*
*रखना मुझे इस तरह*
*सब के दिलों में,*
*कि*
*हर कोई*
*दुआ देने को मजबूर हो जाये।।*

Wednesday, October 4, 2017

ओस की बुँदे हैं,आँखों में नमी है.......

ओस की बूंदे है, आंख में नमी है,
ना उपर आसमां है ना नीचे जमीन है,
ये कैसा मोड है जिन्‍दगी का,
जो लोग खास है उन्‍की ही कमी हैं....

Tuesday, October 3, 2017

वक्त की आवाज


          *✍वक्त से लड़कर*
            *जो नसीब बदल दे !!*
            *इन्सान वही जो*
      *अपनी तक़दीर बदल दे !!*
            *कल क्या होगा*
            *कभी मत सोचो !!*
        *क्या पता कल वक्त खुद*
       *अपनी तस्वीर बदल दे !!*

Friday, September 29, 2017

जीवन से ही हल मिलता है।


*जितना  बडा  सपना  होगा*
  *उतनी  बडी तकलीफें  होगी*
     *और  जितनी  बडी* 
   *तकलीफें  होगी  उतनी* *बडी*       
*कामयाबी होगी*
*कर्म करो तो फल मिलता है,*
       *आज नहीं तो कल* *मिलता है।*
*जितना गहरा अधिक हो कुँआ,*
        *उतना मीठा जल मिलता है ।*
*जीवन के हर कठिन प्रश्न का,*
        *जीवन से ही हल मिलता है।*
             
      ""सदा मुस्कुराते रहिये

Wednesday, September 20, 2017

पुरखे कभी विदा नहीं होते हैं....*

*पुरखे कभी विदा नहीं होते हैं....*

पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते हैं
संतति के कण कण में रचे होते हैं

मज्जा नाड़ी रक्त में प्रवाहित होते हैं
चेतना प्रज्ञा स्मृति में समाहित होते हैं

देहरी आँगन द्वार  दीवार में ढले होते हैं
ऐनक कुर्सी मेज कलम सब में बसे होते है

तीज त्यौहार प्रथा परम्पराओं में होते हैं
भूल चूक होते ही तस्वीरों में प्रगट होते हैं

हौंसलों उम्मीदों और सहारों में भी छिपे होते हैं
विचारों क्रियाओं विरासतों में अवश्य ही होते हैं

बोल चाल भाषा शैली हाव भाव सबमें होते हैं
पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते है

ज्येष्ठ भगिनी के चेहरे के पीछे छिपी माँ  में उपस्थित होते हैं
ज्येष्ठ भ्राता के उत्तरदायित्वों में पिता ही विराजित होते हैं

पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते.....

पुरखे आसमान से नीचे आते आशीर्वादों में होते हैं
पुरखे धरती से ऊपर जाती श्रद्धाओं में होते हैं......

पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते हैं...

*(पितरों को नमन)*

Saturday, September 16, 2017

प्राइवेट नौकरी वाला हूँ..............

बड़ी मेहनत के बाद मैंने *प्राईवेट* नौकरी पायी है,
नौकरी में आया तो जाना, यहाँ एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई है।h

*जहाँ कदम कदम पर ज़िल्लत, और घड़ी घड़ी पर ताने हैं*

यहाँ मुझे अपनी ज़िन्दगी के कई साल बिताने हैं।

अपनी गलती ना हो लेकिन क्षमा याचना हेतु हाथ फैलाने हैं.

फ़िर भी बात-बात पे डेबिट और Punishment ही पाने हैं.

जानता हूँ ये 'अग्निपथ' है, फिर भी मैं चलने वाला हूँ,

क्योंकि मैं प्राईवेट नौकरी वाला हूँ।

जहाँ एक तरफ मुझे boss की, और दूसरी तरफ family वालो की भी सुननी है,

यानी मुझे दो में से एक नहीं, बल्कि दोनों राह चुननी हैं।

ड्यूटी अगर लेट हुयी तो boss  चिल्लाते हैं.

गलती चाहे किसी भी की भी हो सजा तो हम ही पाते हैं.

दो नावों पे सवार हूँ फिर भी सफ़र पूरा करने वाला हूँ,

क्योंकि मैं प्राईवेट नौकरी वाला हूँ।

आसान नहीं है सबको एक साथ खुश रख पाना,

परिवार के साथ वक़्त बिताना, और *Office*में job बचाना।

परिवार के साथ बमुश्किल कुछ वक़्त ही बिता पाता हूँ,

घर जैसे कोई मुसाफिर खाना हो, वहां तो बस आता और जाता हूँ।

फिर भी हर मोड़ पर मैं अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने वाला हूँ,

क्योंकि मैं प्राईवेट नौकरी वाला हूँ

Promotion, incriment की बात पर, हमें सालो लटकाया जाता है,

हक़ की बात करने पर ठेंगा दिखलाया जाता है।

ये एक लड़ाई है, इसमें सबको साथ लेकर चलने वाला हूँ,

क्योंकि मै प्राईवेट नौकरी वाला  हूँ।

छुट्टी मिली ना घर जा सके, Duty में ही ईद-दिवाली-क्रिसमस मनाने का अजब कमाल है।

टिफ़िन से टिफ़िन जब मिलते हैं, तो एक नया ही ज़ायका बन जाता है,

खुद के बनाये खाने में, और घर के खाने में फ़र्क़ साफ़ नज़र आता है।

मजबूरी ने इतना कुछ सिखाया, आगे भी बहुत कुछ सीखने वाला हूँ,

क्योंकि मैं प्राईवेट नौकरी वाला हूँ।

कईलोग समझते है कि बड़ा मजा करते है, प्राईवेट नौकरी में

अब उन्हें कौन समझाए कि प्राईवेट कर्मी के लिए boss के पास सिर्फ वादे है,

Boss चाहे मनमानी करे, स्टाफ के लिए बड़े सख्त कायदे हैं।

सबको मैं बदल नहीं सकता, इसलिए अब ख़ुद को बदलने वाला हूँ,

क्योंकि मैं  प्राईवेट नौकरी  वाला हूँ।

(ये कविता मेरे समस्त प्राईवेट कर्मियो को समर्पित है।

Friday, September 15, 2017

Shayri of my city barabanki

Shayri of my barabanki city
तुम्हारे हुस्न के घण्टाघर में फंसकर
तेरे इश्क में परेड किये जाता है
दिल धड़कता था कभी धनोखर सा
अब यादों का साईं मन्दिर बना जाता है
तुम लगती हो जैसे टण्डन की कचौड़ी
यहाँ गुज्जू के लड्डू सा मुंह हुआ जाता है
तेरी सूरत के सीटी पांवइट को देखकर
मेरा मन भी छाया चौराहा सा मचल जाता है
चहकती हो तुम मालरोड की शाम सी
मेरा प्यार यहाँ शट्टी बाजार सा हुआ जाता हैं
तेरी पतली कमर है जैसे गलियाँ मुंशीगंज की
उस पर मेरा दिल नाके के जाम सा रुक जाता है
बदन है खूबसूरत तुम्हारा आवास विकास सा
और ये आशिक धूल में झरना सा नहाये जाता है।
तेरी जुल्फे है बरगद के जैसी मेरा दिल पारिजात के पेड़ पर लटक जाता है
तेरी शराफत है देवा शरीफ जैसी
मेरा दिल महदेवा दौडा चला जाता है।

Thursday, September 14, 2017

बस हर किसी से प्यार करो..........


               *मन की आँखों से*
              *प्रभु का दीदार करो*
             *दो पल का है अन्धेरा*
        *बस सुबह का इन्तजार करो*
                    *क्या रखा है*
           *आपस के बैर में ए यारो*
           *छोटी सी है ज़िंदगी बस*
             *हर किसी से प्यार करो...*             

dhire dhire umra kat jati hai..........


"धीरे धीरे उम्र कट जाती हैं!
"जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है!
"कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है!
"और कभी यादों के सहारे जिंदगी कट जाती है!
"किनारो पे सागर के खजाने नहीं आते!
"फिर जीवन में दोस्त पुराने नहीं आते!
"जी लो इन पलों को हंस के दोस्तो
"फिर लौट के दोस्ती के जमाने नहीं  आते!

लब्ज ही ऐसी चीज है.........


        " लब्ज़ ही ऐसी  चीज़  है
       जिसकी वजह  से  इंसान
    या  तो  दिल  में  उतर  जाता  है
       या दिल से उतर  जाता  है "
     ज़िन्दगी  के इस  कश्मकश  मैं
     वैसे तो  मैं  भी काफ़ी बिजी  हुँ ,
     लेकिन  वक़्त  का  बहाना  बना कर ,
अपनों  को भूल जाना मुझे आज भी नहीं आता !
जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की,
    बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की,
    बेशक अपनी मंज़िल तक जाना  है ,
    पर  जहाँ से अपने ना दिखे
  वो ऊंचाई  किस  काम  की|

      shayri ki maa ka pati

Wednesday, September 13, 2017

Wo to meri jaan hai


Kal tak jo ajnabi thi , aaj wo mere pass aa gayee
Ankho ke raste who mere dil mein sama gayee
Ankhe hai uski jheel ki tarah gahri, hontho pe uske ek pyari se muskaan hai
Sadgi me jeena aadat hai uski,
Wo koi aur nahi ,wo koi aur nahi
Wo to meri jaan hai,bin kuch bole sab kuch kahe jaate hai
Ye hume pata hai ki who hume kitna chahti hai
Wo koi aur nahi , wo koi aur nahi 
Wo to ab meri jaan hai.................................

shayri ki ma ka pati

kuch kaho na

kuch kaho na


sau janam ka saath apna, sans ka dhadkan se jaise
aas ka jeevan se jaise, kaise kate saal solah
shyam ki jogan ke jaise.
jhooth ke parde na dhondho,
sach kaho na kuch kaho na.

ek duje ke liye hum, hanth me kangan ke jaise,
pyass me sawan ke jaise,bhakt ko bhagwan ke jaise.
jheel si simtee na baitho
kuch baho na , khuch kaho na.

jant hu thak gaye ho, umar ke safar se
saanp se daste shahar se, aas se aur ansu se 
bheed ke gahre bhanwar se, waqt firta hai suno
itna daro na 
kuch kaho na

kiss tarah ladtee rahee ho pyass se parchai se 
neend se angdayeeo se tej se tanhaiyo se
sab tapsya tod dalo
ab saho na
kuch kaho na.

shayri ki maa ka pati

Sab se chipakar dard wo jo muskra diya

Sab se chipakar dard wo jo muskra diya



Sab se chipakar dard wo jo muskra diya

Uski hansi ne aaj to mujhe rula diya.

Lahje se uth raha tha har ek dard ka dhunwa.

chehra bata raha tha ki kuch ganwa diya.

Awaaj me thahrao tha, ankho me nami thi.

Aur kah raha tha ki maine sab bhula diya.

Jaane kya thi logo se use sikaytee

Tanhaayeeo ke desh me khud ko basa diya.

Khud bhi wo hamse bichar kar adhura sa ho gaya,

Mujhko bhi itne logo me tanha bana diya. 

Sab se chipakar dard wo jo muskra diya

Uski hansi ne aaj to mujhe rula diya.

shayri ki maa ka pati

Jane wo kaisi doori thi.


Jane wo kaisi doori thi.

Tere bina ye jindagi adhuri thi,
tere sath na hona meri majburi thi.
hokar bhi paas tu door thi mujhse,
jane ye kaisi doori thi.

Aana chahti thi paas mere,
par jane kyo itna darti thi.
door se dekh mujhe wo,
dhire se sajda karti thi.

Mohabbat me meri wo bhi,
pal-pal anhe bharti thi.
chip -chip ke wo mujhse,
milne ki koshis karti thi.

Jane wo kaisi doori thi.