Friday, September 29, 2017
Wednesday, September 20, 2017
पुरखे कभी विदा नहीं होते हैं....*
*पुरखे कभी विदा नहीं होते हैं....*
पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते हैं
संतति के कण कण में रचे होते हैं
मज्जा नाड़ी रक्त में प्रवाहित होते हैं
चेतना प्रज्ञा स्मृति में समाहित होते हैं
देहरी आँगन द्वार दीवार में ढले होते हैं
ऐनक कुर्सी मेज कलम सब में बसे होते है
तीज त्यौहार प्रथा परम्पराओं में होते हैं
भूल चूक होते ही तस्वीरों में प्रगट होते हैं
हौंसलों उम्मीदों और सहारों में भी छिपे होते हैं
विचारों क्रियाओं विरासतों में अवश्य ही होते हैं
बोल चाल भाषा शैली हाव भाव सबमें होते हैं
पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते है
ज्येष्ठ भगिनी के चेहरे के पीछे छिपी माँ में उपस्थित होते हैं
ज्येष्ठ भ्राता के उत्तरदायित्वों में पिता ही विराजित होते हैं
पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते.....
पुरखे आसमान से नीचे आते आशीर्वादों में होते हैं
पुरखे धरती से ऊपर जाती श्रद्धाओं में होते हैं......
पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते हैं...
*(पितरों को नमन)*
Saturday, September 16, 2017
प्राइवेट नौकरी वाला हूँ..............
बड़ी मेहनत के बाद मैंने *प्राईवेट* नौकरी पायी है,
नौकरी में आया तो जाना, यहाँ एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई है।h
*जहाँ कदम कदम पर ज़िल्लत, और घड़ी घड़ी पर ताने हैं*
यहाँ मुझे अपनी ज़िन्दगी के कई साल बिताने हैं।
अपनी गलती ना हो लेकिन क्षमा याचना हेतु हाथ फैलाने हैं.
फ़िर भी बात-बात पे डेबिट और Punishment ही पाने हैं.
जानता हूँ ये 'अग्निपथ' है, फिर भी मैं चलने वाला हूँ,
क्योंकि मैं प्राईवेट नौकरी वाला हूँ।
जहाँ एक तरफ मुझे boss की, और दूसरी तरफ family वालो की भी सुननी है,
यानी मुझे दो में से एक नहीं, बल्कि दोनों राह चुननी हैं।
ड्यूटी अगर लेट हुयी तो boss चिल्लाते हैं.
गलती चाहे किसी भी की भी हो सजा तो हम ही पाते हैं.
दो नावों पे सवार हूँ फिर भी सफ़र पूरा करने वाला हूँ,
क्योंकि मैं प्राईवेट नौकरी वाला हूँ।
आसान नहीं है सबको एक साथ खुश रख पाना,
परिवार के साथ वक़्त बिताना, और *Office*में job बचाना।
परिवार के साथ बमुश्किल कुछ वक़्त ही बिता पाता हूँ,
घर जैसे कोई मुसाफिर खाना हो, वहां तो बस आता और जाता हूँ।
फिर भी हर मोड़ पर मैं अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने वाला हूँ,
क्योंकि मैं प्राईवेट नौकरी वाला हूँ
Promotion, incriment की बात पर, हमें सालो लटकाया जाता है,
हक़ की बात करने पर ठेंगा दिखलाया जाता है।
ये एक लड़ाई है, इसमें सबको साथ लेकर चलने वाला हूँ,
क्योंकि मै प्राईवेट नौकरी वाला हूँ।
छुट्टी मिली ना घर जा सके, Duty में ही ईद-दिवाली-क्रिसमस मनाने का अजब कमाल है।
टिफ़िन से टिफ़िन जब मिलते हैं, तो एक नया ही ज़ायका बन जाता है,
खुद के बनाये खाने में, और घर के खाने में फ़र्क़ साफ़ नज़र आता है।
मजबूरी ने इतना कुछ सिखाया, आगे भी बहुत कुछ सीखने वाला हूँ,
क्योंकि मैं प्राईवेट नौकरी वाला हूँ।
कईलोग समझते है कि बड़ा मजा करते है, प्राईवेट नौकरी में
अब उन्हें कौन समझाए कि प्राईवेट कर्मी के लिए boss के पास सिर्फ वादे है,
Boss चाहे मनमानी करे, स्टाफ के लिए बड़े सख्त कायदे हैं।
सबको मैं बदल नहीं सकता, इसलिए अब ख़ुद को बदलने वाला हूँ,
क्योंकि मैं प्राईवेट नौकरी वाला हूँ।
(ये कविता मेरे समस्त प्राईवेट कर्मियो को समर्पित है।
Friday, September 15, 2017
Shayri of my city barabanki
तेरे इश्क में परेड किये जाता है
दिल धड़कता था कभी धनोखर सा
अब यादों का साईं मन्दिर बना जाता है
यहाँ गुज्जू के लड्डू सा मुंह हुआ जाता है
तेरी सूरत के सीटी पांवइट को देखकर
मेरा मन भी छाया चौराहा सा मचल जाता है
मेरा प्यार यहाँ शट्टी बाजार सा हुआ जाता हैं
तेरी पतली कमर है जैसे गलियाँ मुंशीगंज की
उस पर मेरा दिल नाके के जाम सा रुक जाता है
और ये आशिक धूल में झरना सा नहाये जाता है।
मेरा दिल महदेवा दौडा चला जाता है।
Thursday, September 14, 2017
लब्ज ही ऐसी चीज है.........
" लब्ज़ ही ऐसी चीज़ है
जिसकी वजह से इंसान
या तो दिल में उतर जाता है
या दिल से उतर जाता है "
ज़िन्दगी के इस कश्मकश मैं
वैसे तो मैं भी काफ़ी बिजी हुँ ,
लेकिन वक़्त का बहाना बना कर ,
अपनों को भूल जाना मुझे आज भी नहीं आता !
जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की,
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की,
बेशक अपनी मंज़िल तक जाना है ,
पर जहाँ से अपने ना दिखे
वो ऊंचाई किस काम की|
shayri ki maa ka pati
Wednesday, September 13, 2017
Wo to meri jaan hai
Kal tak jo ajnabi thi , aaj wo mere pass aa gayee
Ankho ke raste who mere dil mein sama gayee
Ankhe hai uski jheel ki tarah gahri, hontho pe uske ek pyari se muskaan hai
Sadgi me jeena aadat hai uski,
Wo koi aur nahi ,wo koi aur nahi
Wo to meri jaan hai,bin kuch bole sab kuch kahe jaate hai
Ye hume pata hai ki who hume kitna chahti hai
Wo koi aur nahi , wo koi aur nahi
Wo to ab meri jaan hai.................................
shayri ki ma ka pati







