Friday, September 15, 2017

Shayri of my city barabanki

Shayri of my barabanki city
तुम्हारे हुस्न के घण्टाघर में फंसकर
तेरे इश्क में परेड किये जाता है
दिल धड़कता था कभी धनोखर सा
अब यादों का साईं मन्दिर बना जाता है
तुम लगती हो जैसे टण्डन की कचौड़ी
यहाँ गुज्जू के लड्डू सा मुंह हुआ जाता है
तेरी सूरत के सीटी पांवइट को देखकर
मेरा मन भी छाया चौराहा सा मचल जाता है
चहकती हो तुम मालरोड की शाम सी
मेरा प्यार यहाँ शट्टी बाजार सा हुआ जाता हैं
तेरी पतली कमर है जैसे गलियाँ मुंशीगंज की
उस पर मेरा दिल नाके के जाम सा रुक जाता है
बदन है खूबसूरत तुम्हारा आवास विकास सा
और ये आशिक धूल में झरना सा नहाये जाता है।
तेरी जुल्फे है बरगद के जैसी मेरा दिल पारिजात के पेड़ पर लटक जाता है
तेरी शराफत है देवा शरीफ जैसी
मेरा दिल महदेवा दौडा चला जाता है।

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