Tuesday, July 1, 2025

शरारतों में लिपटी मोहब्बत

 


तेरे होंठों की हँसी से कुछ तो बात बनती है,

मेरे दिल की धड़कन भी साथ चलती है।
तेरे झुमकों की खनक, तेरी पायल की झंकार,
रातों में भी गूंजे जैसे इश्क़ का तार।

जब तू बालों को उंगलियों से सुलझाती है,
खुदा कसम, दिल मेरा उलझ-सा जाता है।
तेरे वो तीखे नखरे, तेरी वो मीठी गालियाँ,
लगता है जैसे तकरार में ही छुपी हों मोहब्बत की कहानियाँ।

तेरा दुपट्टा जब हवा में लहराता है,
मेरा होश कहीं दूर उड़ जाता है।
और तू जो कह दे, "क्यों देख रहे हो इतना?"
तो जी करता है कह दूँ, "तू है ही इतनी हसीना!"

तेरी बड़ी-बड़ी आँखें जब घूरती हैं,
दिल में लड्डू नहीं, बम फूटते हैं।
और जब तू मुस्कुराकर कहती है "हट ना!",
तो जान लो, वहीं इश्क़ का कटघरा सज़ता है।

तू कहती है "मैं तो बहुत शरीफ़ हूँ",
फिर वो मासूम-सी शरारत किसके नाम लिखूँ?
तेरे सवाल भी ऐसे कि जवाब ना दूँ तो गुनहगार,
और दे दूँ तो तू कहे "देखो, कितना बेशरम यार!"

तेरे कमरे की लाइट ऑफ़ और तेरी आवाज़ ऑन,
और कहती है "डर लग रहा है…" — पक्का कोई प्लान!
कभी तकिया फेंक के मारती है, कभी किताब,
शायद चाहती है मैं कहूँ – "अब बस, ले लो गले लगाब!"

जब कॉल पे कहती है "सो जाओ अब",
और फिर खुद कहती है "नींद नहीं आ रही यार, कुछ बात कर लो अब!"
तेरी वो प्यारी नादानियाँ, तेरे वो उल्टे-सीधे तर्क,
लगता है जैसे खुदा ने भेजा हो एक पागल-सी लवर्क।

और तू जो रूठ जाती है तो खुदा भी डर जाए,
पर तेरी एक मुस्कान से फिर बहार आ जाए।
तेरा मुँह बनाना, तेरी ऐंठी हुई चाल,
सच बताऊँ, लगता है जैसे इश्क़ की हो मिसाल।

कभी कहती है "मुझे मत घूरो",
और फिर खुद आईने में खुद को घंटों देखो।
कभी कहती है "बात मत करो",
और फिर दो मिनट में "कहाँ हो तुम?" बोलो।

तेरी हर बात में है एक मीठा सा नशा,
जिसमें डूब के भी लगता है — "थोड़ा और हो जाए ज़रा!"
तेरा वो "उफ्फ", तेरा वो "हाय",
दिल करता है बस यही कहूँ – "पगली, तू ना जादूगरनी है

Thursday, April 19, 2018

_ख्वाहिश नहीं मुझे_ _मशहूर होने की,_


*मुन्सी प्रेमचंद जी की एक सुंदर कविता*

_ख्वाहिश नहीं मुझे_
_मशहूर होने की,_
        _आप मुझे पेहचानते हो_
        _बस इतना ही काफी है._
_अच्छे ने अच्छा और_
_बुरे ने बुरा जाना मुझे,_
        _क्यों की जिसकी जितनी जरूरत थी_
        _उसने उतना ही पहचाना मुझे._

_जिन्दगी का फलसफा भी_
_कितना अजीब है,_
        _शामें कटती नहीं और_
        _साल गुजरते चले जा रहें है._
_एक अजीब सी_
_दौड है ये जिन्दगी,_
        _जीत जाओ तो कई_
        _अपने पीछे छूट जाते हैं और_
_हार जाओ तो_
_अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं._

_बैठ जाता हूँ_
_मिट्टी पे अकसर,_
        _क्योंकी मुझे अपनी_
        _औकात अच्छी लगती है._
_मैंने समंदर से_
_सीखा है जीने का सलीका,_
        _चुपचाप से बहना और_
        _अपनी मौज मे रेहना._

_ऐसा नहीं की मुझमें_
_कोई ऐब नहीं है,_
        _पर सच कहता हूँ_
        _मुझमें कोई फरेब नहीं है._
_जल जात है मेरे अंदाज से_
_मेरे दुश्मन,_
        _क्यों की एक मुद्दत से मैंने न मोहब्बत_
        _बदली और न दोस्त बदले हैं._

_एक घडी खरीदकर_
_हाथ मे क्या बांध ली_
        _वक्त पीछे ही_
        _पड गया मेरे._
_सोचा था घर बना कर_
_बैठुंगा सुकून से,_
        _पर घर की जरूरतों ने_
        _मुसाफिर बना डाला मुझे._

_सुकून की बात मत कर_
_ऐ गालिब,_
        _बचपन वाला इतवार_
        _अब नहीं आता._
_जीवन की भाग दौड मे_
_क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ?_
        _हँसती-खेलती जिन्दगी भी_
        _आम हो जाती है._

_एक सवेरा था_
_जब हँसकर उठते थे हम,_
        _और आज कई बार बिना मुस्कुराये_
        _ही शाम हो जाती है._
_कितने दूर निकल गए_
_रिश्तों को निभाते निभाते,_
        _खुद को खो दिया हम ने_
        _अपनों को पाते पाते._

_लोग केहते है_
_हम मुस्कुराते बहुत है,_
        _और हम थक गए_
        _दर्द छुपाते छुपाते._
_खुश हूँ और सबको_
_खुश रखता हूँ,_
        _लापरवाह हूँ फिर भी_
        _सब की परवाह करता हूँ._

_मालूम है_
_कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी_
        _कुछ अनमोल लोगों से_
        _रिश्ता रखता हूँ._

Sunday, March 25, 2018

थोडा थक गया हूँ

*थोडा थक गया हूँ , , ,*
*दूर निकलना छोड दिया है।*
*. . . पर ऐसा नहीं है की , , ,*
*मैंने चलना छोड दिया है ।।*

     *फासले अक्सर रिश्तों में , , ,*
    *. . . दूरी बढ़ा देते हैं।*
     *. . . पर ऐसा नही है की , , ,*
*मैंने अपनों से मिलना छोड दिया है ।।*

*हाँ . . . ज़रा अकेला हूँ , , ,* *दुनिया की भीड में।*
*. . . पर ऐसा नही की , , ,*
*मैंने अपनापन छोड दिया है ।।*

    *याद करता हूँ अपनों को, ,*
  *. . . परवाह भी है मन में।*
    *बस , कितना करता हूँ , , ,*
*ये बताना छोड दिया।।*
                 

Saturday, December 30, 2017

*ये वक्त है साहब.. ज़रूर बदलता है*

*"अनुभव कहता है*
*खामोशियाँ ही बेहतर हैं,*
*शब्दों से लोग रूठते बहुत हैं..."*

*जिंदगी गुजर गयी....*
*सबको खुश करने में ..*

*जो खुश हुए वो अपने नहीं थे,*
*जो अपने थे वो कभी खुश नहीं* *हुए...*

*कितना भी समेट लो..*
*हाथों से फिसलता ज़रूर है..*

*ये वक्त है साहब..*
*बदलता ज़रूर है..*

Wednesday, December 27, 2017

जब आंख खुली तो अम्‍मा की गोदी का एक सहारा था उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको भूमण्‍डल से प्‍यारा था


*एक बार इस कविता को*
*दिल से पढ़िये*
*शब्द शब्द में गहराई है...*

*जब आंख खुली तो अम्‍मा की*
*गोदी का एक सहारा था*
*उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको*
*भूमण्‍डल से प्‍यारा था*

*उसके चेहरे की झलक देख*
*चेहरा फूलों सा खिलता था*
*उसके स्‍तन की एक बूंद से*
*मुझको जीवन मिलता था*

*हाथों से बालों को नोंचा*
*पैरों से खूब प्रहार किया*
*फिर भी उस मां ने पुचकारा*
*हमको जी भर के प्‍यार किया*

*मैं उसका राजा बेटा था*
*वो आंख का तारा कहती थी*
*मैं बनूं बुढापे में उसका*
*बस एक सहारा कहती थी*

*उंगली को पकड. चलाया था*
*पढने विद्यालय भेजा था*
*मेरी नादानी को भी निज*
*अन्‍तर में सदा सहेजा था*

*मेरे सारे प्रश्‍नों का वो*
*फौरन जवाब बन जाती थी*
*मेरी राहों के कांटे चुन*
*वो खुद गुलाब बन जाती थी*

*मैं बडा हुआ तो कॉलेज से*
*इक रोग प्‍यार का ले आया*
*जिस दिल में मां की मूरत थी*
*वो रामकली को दे आया*

*शादी की पति से बाप बना*
*अपने रिश्‍तों में झूल गया*
*अब करवाचौथ मनाता हूं*
*मां की ममता को भूल गया*

*हम भूल गये उसकी ममता*
*मेरे जीवन की थाती थी*
*हम भूल गये अपना जीवन*
*वो अमृत वाली छाती थी*

*हम भूल गये वो खुद भूखी*
*रह करके हमें खिलाती थी*
*हमको सूखा बिस्‍तर देकर*
*खुद गीले में सो जाती थी*

*हम भूल गये उसने ही*
*होठों को भाषा सिखलायी थी*
*मेरी नीदों के लिए रात भर*
*उसने लोरी गायी थी*

*हम भूल गये हर गलती पर*
*उसने डांटा समझाया था*
*बच जाउं बुरी नजर से*
*काला टीका सदा लगाया था*

*हम बडे हुए तो ममता वाले*
*सारे बन्‍धन तोड. आए*
*बंगले में कुत्‍ते पाल लिए*
*मां को वृद्धाश्रम छोड आए*

*उसके सपनों का महल गिरा कर*
*कंकर-कंकर बीन लिए*
*खुदग़र्जी में उसके सुहाग के*
*आभूषण तक छीन लिए*

*हम मां को घर के बंटवारे की*
*अभिलाषा तक ले आए*
*उसको पावन मंदिर से*
*गाली की भाषा तक ले आए*

*मां की ममता को देख मौत भी*
*आगे से हट जाती है*
*गर मां अपमानित होती*
*धरती की छाती फट जाती है*

*घर को पूरा जीवन देकर*
*बेचारी मां क्‍या पाती है*
*रूखा सूखा खा लेती है*
*पानी पीकर सो जाती है*

*जो मां जैसी देवी घर के*
*मंदिर में नहीं रख सकते हैं*
*वो लाखों पुण्‍य भले कर लें*
*इंसान नहीं बन सकते हैं*

*मां जिसको भी जल दे दे*
*वो पौधा संदल बन जाता है*
*मां के चरणों को छूकर पानी*
*गंगाजल बन जाता है*

*मां के आंचल ने युगों-युगों से*
*भगवानों को पाला है*
*मां के चरणों में जन्‍नत है*
*गिरिजाघर और शिवाला है*

*हर घर में मां की पूजा हो*
*ऐसा संकल्‍प उठाता हूं*
*मैं दुनियां की हर मां के*
*चरणों में ये शीश झुकाता हूं..*

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Saturday, December 23, 2017

कभी हँसते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी* *कभी रोते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी।*

*कभी हँसते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी*
*कभी रोते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी।*
*न पूर्ण विराम सुख में,*
*न पूर्ण विराम दुःख में,*
*बस जहाँ देखो वहाँ अल्पविराम छोड़ देती है ये जिंदगी।*
*प्यार की डोर सजाये रखो,*
*दिल को दिल से मिलाये रखो,*
*क्या लेकर जाना है साथ मे इस दुनिया से,*
*मीठे बोल और अच्छे व्यवहार से*
        *रिश्तों को बनाए रखो*...........

Wednesday, December 13, 2017

जियो और जीना सिखा दो

*" चेहरे की हंसी से गम को भुला दो*
    *कम बोलो पर सब कुछ बता दो*
   *ख़ुद ना रूठो पर सबको हंसा दो*
      *यही राज है जिन्दगी का*
  *जियो और जीना सिखा दो "*